बरघाट में 'पीएम आवास' के नाम पर टैक्स का मायाजाल, गरीबों की जेब पर डाका?
बरघाट (सिवनी) | प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य गरीबों को छत देना था, लेकिन बरघाट नगर परिषद ने इसे राजस्व वसूली का हथियार बना लिया है। जिस जनता का टैक्स कच्चे मकान के समय मात्र ₹60 था, आज उनसे हजारों रुपये वसूले जा रहे हैं।
खाली जमीन पर भी नजर, जनता बेहाल
हैरानी की बात यह है कि नगरीय प्रशासन केवल मकान ही नहीं, बल्कि निस्तार के लिए छोड़ी गई खाली जमीन को भी नापकर उस पर टैक्स थोप रहा है। पीड़ित जनता का कहना है कि "जमीन हमारी है और घर सरकार ने दिया, फिर प्रशासन हमसे ऐसे टैक्स क्यों वसूल रहा है जैसे हमने कोई आलीशान फ्लैट खरीदा हो?"
क्या यह कोई बड़ा घोटाला है?
स्थानीय लोग इसे प्रशासनिक षड्यंत्र करार दे रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या पीएम आवास के नियमों की आड़ में मनमानी वसूली की जा रही है? क्या गरीब जनता को 'लॉलीपॉप' दिखाकर अब उन्हें अंतहीन टैक्स के चक्रव्यूह में फंसाया जा रहा है?
मुख्य बिंदु जो खड़े करते हैं सवाल:
* अचानक वृद्धि: ₹60 से सीधे हजारों में कैसे पहुंचा टैक्स?
* अवैध नापजोख: खाली पड़ी पुश्तैनी जमीन पर टैक्स वसूलने का आधार क्या है?
* पारदर्शिता का अभाव: क्या जनता को गुमराह कर अवैध वसूली की जा रही है?
निष्कर्ष: बरघाट की सड़कों पर अब यह चर्चा आम है कि यह योजना गरीब का भला करने के लिए है या प्रशासन की तिजोरी भरने के लिए। जनता अब इस 'टैक्स आतंक' के खिलाफ आर-पार की लड़ाई के मूड में है और मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग कर रही है।
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