महा-रिपोर्ट: 'सीएम हेल्पलाइन' अब अधिकारियों की जागीर नहीं, जनता का 'पावर बटन' है!
मध्य प्रदेश: शासन की 181 सीएम हेल्पलाइन को लेकर अब हवा बदल चुकी है। प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि अधिकारियों ने अपने स्वार्थ के लिए इस पोर्टल को कचरा समझ लिया था, लेकिन अब पासा पलट गया है। यह स्पष्ट हो चुका है कि 181 पोर्टल की असली ताकत अब सरकार या भ्रष्ट अधिकारियों के हाथ में नहीं, बल्कि सीधे पीड़ित जनता के हाथ में है।
भ्रष्ट तंत्र की 'पतलून गीली': जनता का बढ़ता प्रहार
जब कोई सजग नागरिक भ्रष्टाचार की पोल खोलता है, तो कमीशनखोर अधिकारियों और ठेकेदारों की नींद उड़ जाती है। अब तक नियम यह था कि जो आरोपी है, वही जांच करता था, जिससे भ्रष्टाचार फाइलों में दब जाता था। लेकिन अब जागरूक जनता ने इस 'सेल्फ-चेक' सिस्टम को चुनौती दी है। जब जनता अड़ जाती है, तो बड़े से बड़े करप्ट अधिकारी को अपनी कुर्सी बचाना मुश्किल हो जाता है।
धमकी और साजिश: भ्रष्टाचारियों का आखिरी हथियार
सिवनी जिले की बरघाट तहसील का मामला इस बात का प्रमाण है कि जब करप्ट अधिकारी डरते हैं, तो वे शिकायतकर्ता को ही 'ब्लैकमेलर' घोषित कर देते हैं। पंचायतों से लेकर जिला स्तर तक कमीशन की जो चेन बनी है, उसे जनता की एक शिकायत तोड़ रही है। नेताओं और वकीलों के जरिए फोन करवाकर एफआईआर की धमकी देना असल में अधिकारियों की कमजोरी और हार को दर्शाता है।
कमीशन का 'कैंसर' और निष्पक्ष जांच की मांग
धरातल पर काम शून्य और कागजों पर बिल पास—यह खेल अब और नहीं चलेगा। जनता की मांग है कि:
* स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम: जांच के लिए भोपाल या अन्य जिलों की टीमें भेजी जाएं, ताकि स्थानीय साठगांठ खत्म हो सके।
* रेंडम फिजिकल वेरिफिकेशन: अधिकारी दफ्तर में बैठकर नहीं, बल्कि मौके पर जाकर काम देखें।
* जनता की पावर: अधिकारी समझ लें कि 181 अब उनकी मनमर्जी का खिलौना नहीं, बल्कि जनता का वह हथियार है जो भ्रष्टाचार की जड़ें खोदने की ताकत रखता है।
अंतिम संदेश
भ्रष्ट तंत्र को यह समझ लेना चाहिए कि जनता अब डरने वाली नहीं है। 181 पोर्टल के माध्यम से जनता ने शासन और विकास की चाबी अपने हाथ में ले ली है। जो अधिकारी जनता के हक का पैसा खाकर अपने बच्चों का भविष्य संवारने का सपना देख रहे हैं, उन्हें अब कानून के कटघरे में खड़ा होना ही होगा।
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