लाखों खर्च, फिर भी ताला... आखिर किसे मिल रहा 'सुदर्शन गौशाला' का लाभ?
लालपुर (बरघाट): शासन की जनकल्याणकारी योजनाएं जब कागजों तक सीमित रह जाती हैं, तो उसका खामियाजा आम जनता और बेजुबान जानवरों को भुगतना पड़ता है। ऐसा ही एक ज्वलंत उदाहरण बरघाट तहसील के ग्राम पंचायत लालपुर में देखने को मिल रहा है, जहां लाखों रुपये की लागत से बनी 'सुदर्शन गौशाला' आज खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।
करोड़ों का बजट, पर एक भी गाय नहीं
हैरानी की बात यह है कि शासन ने इस गौशाला के निर्माण पर लाखों रुपये खर्च किए ताकि क्षेत्र के आवारा पशुओं को आश्रय मिल सके और किसानों की फसलें सुरक्षित रहें। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। वर्तमान में इस गौशाला के मुख्य गेट पर ताला लटका हुआ है। परिसर के अंदर एक भी गाय, बैल या भैंस नजर नहीं आती।
गायों की जगह कुत्तों का डेरा
स्थानीय निवासियों में इस अव्यवस्था को लेकर भारी आक्रोश है। मौके पर मौजूद एक ग्रामीण ने बताया कि:
> "शासन ने पैसा तो बहुत खर्च किया, लेकिन योजना पूरी तरह ध्वस्त नजर आ रही है। पहले यहां कुछ जानवर हुआ करते थे, लेकिन अब महीनों से यह बंद पड़ा है। अब यहां गायों की जगह आवारा कुत्तों का डेरा रहता है।"
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जिम्मेदार कौन?
जानकारी के अनुसार, इस गौशाला के संचालन की जिम्मेदारी एक स्थानीय समूह को सौंपी गई है। बावजूद इसके, गौशाला का ताला न खुलना और पशुओं का अभाव होना कई गंभीर सवाल खड़े करता है:
* शासन से मिलने वाला रखरखाव का बजट आखिर कहां जा रहा है?
* यदि गौशाला बंद है, तो क्षेत्र के आवारा पशु सड़कों पर क्यों घूम रहे हैं?
* क्या प्रशासनिक अधिकारियों ने कभी इस गौशाला का औचक निरीक्षण किया?
निष्कर्ष
एक तरफ सरकार 'गौ-संरक्षण' के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर लालपुर की यह तस्वीर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती है। ग्रामीणों की मांग है कि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच हो और जल्द से जल्द इस गौशाला को सुचारू रूप से शुरू किया जाए, ताकि सरकारी धन का दुरुपयोग रुके और पशुओं को सही आश्रय मिल सके।
